धरमजयगढ़ क्षेत्र के ग्राम पंचायत पुटुकछार के आश्रित ग्राम फूलगोछा में मंगलवार की रात हेमंत राठिया की मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि उनकी तबीयत उल्टी-दस्त के कारण बिगड़ी और इसी के चलते उनकी मृत्यु हुई। हालांकि, चिकित्सकीय परीक्षण के अभाव में मृत्यु के वास्तविक कारण की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में यह घटना केवल एक मौत का मामला नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था, जनजागरूकता और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि धरमजयगढ़ तहसील मुख्यालय से अपेक्षाकृत कम दूरी पर स्थित गांव में एक गंभीर मरीज को अस्पताल तक क्यों नहीं पहुंचाया गया? क्या 108 एम्बुलेंस सेवा को फोन किया गया था? यदि नहीं, तो क्यों? क्या स्वास्थ्य विभाग या स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों को इसकी सूचना दी गई थी? यदि सूचना नहीं दी गई, तो यह चूक किस स्तर पर हुई?
यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि यदि स्वास्थ्य विभाग को घटना की जानकारी ही नहीं दी गई, तो बिना तथ्यों के विभाग को सीधे तौर पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन इससे जिम्मेदारी का सवाल खत्म नहीं हो जाता। असली प्रश्न यह है कि ऐसी गंभीर स्थिति में स्वास्थ्य तंत्र तक सूचना पहुंची क्यों नहीं? क्या ग्रामीणों में जागरूकता की कमी है? क्या आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं पर भरोसे का अभाव है? या फिर स्थानीय स्तर पर सूचना देने और मरीज को अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है?
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यदि डॉक्टर ने मरीज का परीक्षण ही नहीं किया, तो यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा रहा है कि मौत उल्टी-दस्त से ही हुई? क्या यह केवल परिजनों का अनुमान है या इसके पीछे कोई चिकित्सकीय आधार भी है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।
मामले की जानकारी लेने के लिए ग्राम प्रमुख से भी संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ऐसे में कई महत्वपूर्ण सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।
बरसात का मौसम अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ है। ऐसे समय में उल्टी-दस्त जैसी बीमारी से मौत की आशंका सामने आना स्वास्थ्य तंत्र के लिए चेतावनी है। यदि वास्तव में यह मृत्यु उल्टी-दस्त से हुई है, तो स्वास्थ्य विभाग को गांव में तत्काल स्वास्थ्य जांच, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता और बीमारी की निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए। वहीं यदि मृत्यु का कारण कुछ और है, तो वह भी स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि अफवाहों की जगह तथ्य सामने आ सकें।
यह घटना बताती है कि केवल अस्पताल और एम्बुलेंस उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। जब तक बीमारी की सूचना समय पर संबंधित विभाग तक नहीं पहुंचेगी, मरीज को तत्काल उपचार नहीं मिलेगा और ग्रामीणों में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति भरोसा व जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा।
अब सबसे बड़ी आवश्यकता है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक मृत्यु कारण सार्वजनिक करें, यह स्पष्ट करें कि सूचना किस स्तर पर रुकी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए ठोस कदम उठाएं।

