धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में सामने आ रहे घटनाक्रम ने पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। डिजिटल प्रक्रिया के नाम पर जिस व्यवस्था को जवाबदेह और पारदर्शी बताया जाता रहा है, वही अब कोरे बिलों और अदृश्य प्रविष्टियों का माध्यम बनती दिखाई दे रही है।
चर्चा है कि कई ग्राम पंचायतों में अनपढ़ अथवा कम पढ़े-लिखे सरपंचों की तकनीकी सीमाओं का लाभ उठाकर पंचायत सचिव प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों का संचालन अपने स्तर पर कर रहे हैं। सरपंचों से डिजिटल हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं, लेकिन किन मदों में, किन दस्तावेजों पर और किस भुगतान के लिए—इसकी स्पष्ट जानकारी उन्हें नहीं दी जाती। इसके बाद पंचायत पोर्टल पर ऐसे बिल अपलोड किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं, जिनका ज़मीनी कार्यों से कोई स्पष्ट मेल नहीं दिखता, फिर भी भुगतान निर्बाध रूप से हो जाता है।
इसी कड़ी में धरमजयगढ़ की एक ग्राम पंचायत में कोरे बिलों के आधार पर भुगतान किए जाने के मामले में पंचायत सचिव और सरपंच के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामला फिलहाल जांचाधीन है और जांच के निष्कर्ष आना शेष हैं। लेकिन इस प्रकरण से जुड़े कुछ तथ्य जांच से पहले ही कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि जिस सरपंच को आज इस प्रकरण में आरोपी बनाया गया है, उसी सरपंच सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने कुछ समय पूर्व पंचायत सचिव को हटाने की मांग करते हुए सक्षम अधिकारियों को लिखित आवेदन सौंपा था। यह तथ्य अपने आप में यह दर्शाता है कि सचिव की कार्यप्रणाली से पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधि भी असंतुष्ट थे। ऐसे में यह मान लेना कि पंचायत पोर्टल पर कोरे बिल अपलोड किए जाने की पूरी जानकारी सरपंच को थी, संदेह के घेरे में आता है।
पंचायतों में पोर्टल संचालन, प्रविष्टि अपलोड और तकनीकी प्रक्रियाओं की जिम्मेदारी व्यवहारिक रूप से सचिव के पास होती है। डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के उपयोग में भी सचिव की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में सबसे बड़ा और केंद्रीय प्रश्न यही है कि यदि कोरे बिल अपलोड हुए हैं, तो यह कार्य वास्तव में किसके द्वारा किया गया ।
यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं माना जा रहा है। क्षेत्र की अन्य ग्राम पंचायतों को लेकर भी इसी तरह की शिकायतें लंबे समय से चर्चा में हैं। ऐसे में यह सवाल अब टालना कठिन हो गया है कि क्या प्रशासन सभी मामलों में समान रूप से जांच करेगा, या फिर एक-दो प्रकरणों में कार्रवाई कर शेष मामलों पर मौन साध लिया जाएगा।
पंचायत व्यवस्था में जनविश्वास बनाए रखने के लिए अब औपचारिकताओं से आगे बढ़कर यह स्पष्ट करना आवश्यक हो गया है कि पोर्टल पर कोरे बिल अपलोड करने वाला हाथ किसका था और जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी। अन्यथा डिजिटल व्यवस्था भी काग़ज़ी विकास की तरह केवल दिखावे तक सिमट कर रह जाएगी।