घटिया निर्माण का नमूना बना 10 लाख का स्टॉप डैम, एक साल में ही जवाब दे गया
पक्का डेम के उपर कच्चा डेम बनाया गया है ऐसा प्रत्येक बरसात के बाद बनाना पड़ेगा।
ग्राम पंचायत जोगड़ा में 15वें वित्त आयोग मद से लगभग 10 लाख रुपये की लागत से निर्मित स्टॉप डैम एक वर्ष के भीतर ही अनुपयोगी हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार निर्माण के दौरान डैम के तल में बालू डाली गई थी, जो तेज बहाव में बह गई। इसके चलते डैम का निचला हिस्सा खोखला हो गया और पानी नीचे से लगातार रिसने लगा, जिससे डैम पानी संग्रह करने में पूरी तरह असमर्थ हो गया।
ग्रामीणों ने जब इस गंभीर खामी की सूचना संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदारों को दी, तो उनके बताए अनुसार करीब 63 हजार रुपये खर्च कर डैम के ऊपर मिट्टी डालकर पानी रोकने का प्रयास किया गया। हालांकि यह जुगाड़ भी नाकाम साबित हुआ। अब कथित तौर पर कुछ और तरकीबें अपनाकर खामियों को ढकने की कोशिश की जा रही है, ताकि घटिया निर्माण पर पर्दा डाला जा सके।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि डैम के स्थल चयन, तकनीकी स्वीकृति और गुणवत्ता जांच आखिर किस आधार पर की गई, कि करोड़ों नहीं तो लाखों की सार्वजनिक राशि से बना यह निर्माण महज एक साल में ही बेकार हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो ऐसे ही घटिया निर्माण होते रहेंगे और सरकारी धन की बर्बादी जारी रहेगी।
ग्राम पंचायत जोगड़ा में 15वें वित्त आयोग मद से निर्मित लगभग 10 लाख रुपये का स्टॉप डैम न सिर्फ नीचे से बल्कि ऊपर से भी घटिया निर्माण का उदाहरण बन चुका है। डैम की दीवारों को देखकर ही निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जहां तकनीकी मानकों की खुलेआम अनदेखी साफ दिखाई देती है। कमजोर और असंतुलित संरचना यह संकेत देती है कि निर्माण के समय न तो सामग्री की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया और न ही इंजीनियरिंग मानकों का पालन किया गया।
स्थिति को और गंभीर बनाते हुए डैम का गेट लकड़ी से बनाया गया है, जो इस निर्माण की स्तरहीनता पर मानो सोने पे सुहागा साबित हो रहा है। जहां ऐसे स्थायी और जल संरचनाओं में मजबूत लोहे या मानक सामग्री का उपयोग अनिवार्य होता है, वहां लकड़ी का गेट लगाया जाना पूरे निर्माण पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि नीचे से रिसाव, ऊपर से कमजोर दीवारें और लकड़ी का गेट—तीनों मिलकर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह स्टॉप डैम योजना के उद्देश्यों को पूरा करने में पूरी तरह विफल हो चुका है। अब सवाल यह है कि स्थल चयन से लेकर तकनीकी स्वीकृति, निर्माण और गुणवत्ता जांच तक किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई, कि सार्वजनिक धन से बना यह डैम महज एक साल में ही अनुपयोगी और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।
