ग्राम पंचायत क्रिन्धा इन दिनों विकास की उस ऊँचाई पर है, जहाँ से ज़मीन पर कुछ भी दिखाई नहीं देता—सब कुछ केवल फाइलों में ही चमकता है। पहाड़ों की गोद में बसे इस गाँव में विकास की पताका इतनी ऊँचाई पर फहराई जा रही है कि ग्रामीणों की नज़र ही नहीं पहुँच पा रही।
सड़कें बनीं या बनने का सपना देखा गया—यह शोध का विषय है। सड़कों के किनारे बनाई गई नालियाँ निर्माण के साथ ही सेवानिवृत्त हो गईं। कुछ नालियाँ इतनी भावुक रहीं कि “पूर्ण होने” से पहले ही मिट्टी में विलीन हो गईं, ताकि अधूरेपन का दर्द कोई न देख सके।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने घरों ने भी धैर्य खो दिया है। वर्षों से प्रतीक्षा में खड़े ये आवास अब खंडहर बनने की तैयारी में हैं। लगता है इन्हें भी आदेश मिला है—“थोड़ा और रुक जाओ, शायद अगली फाइल में किस्मत खुल जाए।”
खेल मैदान की बात करें तो वहाँ खिलाड़ियों की ज़रूरत ही खत्म कर दी गई है। आसपास की मिट्टी से मैदान को जैसे-तैसे समतल कर दिया गया है, ताकि खेल की जगह कल्पना दौड़ सके। गेंद नहीं, सवाल उछल रहे हैं—यह मैदान है या मिट्टी का सम्मान समारोह?
मरम्मत कार्य तो ऐसा किया गया है कि विशेषज्ञ भी भ्रमित हो जाएँ। इतनी सफ़ाई से मरम्मत हुई है कि पता ही नहीं चलता मरम्मत हुई कहाँ है। भवनों के आसपास पड़ा मलबा और निर्माण सामग्री आज भी अपनी पहचान ढूंढ रही है—मानो कह रही हो, “हम भी कभी किसी योजना का हिस्सा थे।”
कुल मिलाकर ग्राम पंचायत क्रिन्धा में विकास भगवान भरोसे नहीं, बल्कि कागज़ भरोसे चल रहा है। ज़मीनी हकीकत पूछती है—“हमारा नंबर कब आएगा?” और फाइलें मुस्कुरा कर जवाब देती हैं—“अगले निरीक्षण में देखेंगे।”
